अंततः वह घडी आ ही गयी जिसके लिए मेने इतने दिन तपस्या की और बिना माता पिता और भैया के सहयोग के ये कार्य हो ही नहीं सकता था । गौ कृपा और गाय के गोबर , गोमूत्र , लस्सी और राख से आखिरकार हम पर धान (चावल ) की वर्षा हो ही गयी । मेने प्रण लिया था की में खेत एक दाना भी urea, insecticide , weedicide ,pesticide का नहीं डालूँगा और ऐसा करने में गोमाता ने मुझे पूरा सहयोग दिया| इन चावलों में गोबर गोमूत्र की खाद , लस्सी राख और गोमूत्र का spray किया गया और फल स्वरुप एक उच्चतम श्रेणी के चावल प्राप्त हुए । न कोई रोग और न ही ये आंधी तूफान में बाकी धानों की तरह गिरे । इन धानों को उगाने में प्रकृति का पूरा ध्यान रखा गया । कम से कम पानी का उपयोग हुआ और न ही rice straw को जलाया गया जो अतयंत प्रदूषणकारी है ।

धान का जब छिलका निकलवाकर चावल प्राप्त हुए तो सबसे पहले हमने अपनी गौओं (बहुल और राधा ) को खीर का भोग लगाया और उसके बाद जब हमने चावल का स्वाद लिया तो वो अद्वित्य था । आज तक जिंदगी में ऐसा कुछ खाया न था । चावल बनते वक़्त पुरे घर में खुशबू ही खुशबू फेल जाती है ।

इस प्रकार की खेतीे को देखकर आस पास के किसान भी प्रेरित हुएं हैं और उनमें भी ऐसा करने की कुछ लौ जगी है । यह मेरे लिए सबसे बड़ी जीत है| यह मेरा प्रकृति संरक्षण के प्रति पहला बड़ा प्रयास है और आगे इसे और बढ़ाना है| इस सब प्रयास में मेरी बुआ के बेटे, सुधीर भैया ने मेरी बहुत मदद की । कुछ इस प्रकार ये सब घटित हुआ :-